आसमान झुका था।
घुटा जाता है...
और कतारों में खड़े आदमी
नलके में बंद पानी की तरह
आधी सी आज़ादी के सहारे
धीरे धीरे रिसते।
किसने बना दिया?
हमारा सारा ज़हर पी जाता है।
कालिख़
स्याह बादल और धुआं
मेरी तस्वीर क्यों उकेरते हैं?
सहमी,
दायरों में करीने से समेटी
किसी बच्चे की अल्हड़ लिखाई
परिंदों की परवाज़
और इन्द्रधनुष का ख्वाब
सीधी सपाट सीमित
रेखाओं में
टूट के बिख़रते...
बचपन को उन्ही पन्नो में
दफ़नाते।
गलत पड़े अनुस्वार सा
अपने अस्तित्व का प्रमाण
ख़ुद से मांगता
रोज सुबह, गला खख़ार
जगाता।
मिट पायेगी?
आज सब अस्त हो जाते
तो शायद कल सुबह हो जाती।




